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भारतीय भाषाओं पर एक्ज़िम बैंक का सेमिनार, डॉ. गणेश देवी बोले- भाषाओं का समाप्त होना, मानवता का समाप्त होना है

भारतीय निर्यात-आयात बैंक (एक्ज़िम बैंक) ने बैंक नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति (नराकास), मुंबई के साथ मिलकर भारतीय भाषाओं की वर्तमान स्थिति और भविष्य विषय पर एक दिवसीय सेमिनार का आयोजन किया। सेमिनार में ख्याति प्राप्त भाषाविद, चिंतक और सांस्कृतिक कार्यकर्ता पद्मश्री डॉ. गणेश एन. देवी, हिन्दी-मराठी के विद्वान, साहित्यकार डॉ. दामोदर खड़से और वरिष्ठ पत्रकार तथा भाषा चिंतक श्री राहुल देव मुख्य अतिथियों के रूप में उपस्थित रहे। सेमिनार के दौरान एक्ज़िम बैंक के प्रबंध निदेशक श्री डेविड रस्कीना और राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, भारत सरकार के वरिष्ठ अधिकारी तथा मुंबई स्थित विभिन्न बैंकों, वित्तीय संस्थाओं और उपक्रमों के वरिष्ठ अधिकारी विशेष रूप से उपस्थित रहे। सेमिनार में मुंबई स्थित विभिन्न कॉलेजों के हिन्दी विभागों के प्रोफेसरों तथा छात्रों ने भी हिस्सा लिया। 

सेमिनार में वक्ताओं ने भारतीय भाषाओं के भविष्य, भारतीय भाषाओं का सह-अस्तित्व और भारत में भाषाई विविधता जैसे विषयों पर चर्चा की। 

पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया के लिए पहचाने जाने वाले पद्मश्री गणेश एन. देवी ने कहा कि जैसे एक मुद्रा अर्थ की होती है, वैसे ही अर्थ की दूसरी मुद्रा भाषा होती है। इसलिए भाषा से जुड़ना बहुत जरूरी है। यह सर्वे किसी व्यक्ति द्वारा भारत में किया गया अब तक का सबसे बड़ा भाषाई सर्वे है। इस भाषाई सर्वेक्षण के अब तक 68 खंड प्रकाशित हो चुके हैं और भारत की जिंदा भाषाओं के दस्तावेजीकरण का यह काम अब भी जारी है। उन्होंने कहा कि हम जिसे मानवता कहते हैं, भाषा उसका संचय है। इसीलिए भाषाओं का समाप्त होना मानवता का समाप्त होना है। उन्होंने कहा कि मैं सभी भाषाओं से प्यार करता हूं और सभी भाषाएं मेरे दिल के बहुत करीब हैं। 

हिन्दी-मराठी लेखक डॉ. दामोदर खड़से ने भारतीय भाषाओं के सह-अस्तित्व के बारे में बात करते हुए कहा कि इसमें अनुवाद की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। मराठी से हिन्दी में 80 से ज्यादा पुस्तकों का स्वयं अनुवाद कर चुके डॉ. खड़से ने साहित्य जगत से विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से बताया कि किस प्रकार दूसरी भारतीय भाषाओं के साहित्यकार हिन्दी में प्रकाशित होने के बाद समूचे भारत में सराहे गए। उन्होंने कहा कि हिन्दी भारतीय भाषाओं को अखिल भारतीय स्तर पर ले आती है। वहीं, डॉ. विश्वनाथ झा, उप निदेशक, राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, ने आर्य और द्रविड़ भाषा परिवारों में समानताओं पर बात की और बताया कि हमें उन दोनों भाषा परिवारों को अलग-अलग नहीं देखना चाहिए।

वरिष्ठ पत्रकार और भाषा चिंतक श्री राहुल देव ने कहा कि बहुत से लोगों को यह संकट दिखता नहीं है कि हमारी भाषाओं का क्षरण हो रहा है। बहुत से लोग इसे रोजगार से जोड़कर देखते हैं। लेकिन इसे बड़े परिप्रेक्ष्य में देखना जरूरी है। यह सिर्फ भाषा का संकट नहीं है। यह भारतीयता के जीवंत रहने का संकट है। उन्होंने कहा कि नवाचार, मौलिक चिंतन, शोध, आविष्कार और आर्थिक प्रगति इन सबसे भाषा का संबंध है। उन्होंने कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है। भाषा हमारे स्व का, हमारी चेतना का निर्माण करने वाली शक्ति है। 

बैंक ऑफ महाराष्ट्र के बैंक ऑफ महाराष्ट्र और बैंक नराकास अध्यक्ष श्री विजय कांबले ने इस विचारोत्तेजक सेमिनार के आयोजन के लिए एक्ज़िम बैंक के इस प्रयास की सराहना की। 

अधिक जानकारी के लिए संपर्क कीजिएः
श्री धर्मेंद्र सचान, महाप्रबंधक, भारतीय निर्यात-आयात बैंक, केंद्र एक भवन, 21वीं मंज़िल, विश्व व्यापार केंद्र संकुल, कफ़ परेड, मुंबई। ईमेलः rajbhasha@eximbankindia.in