भारत को अपनी व्यापार नीति को और अधिक उदार बनाने की जरूरतः प्रो. अरविंद पनगड़िया
अंतरराष्ट्रीय व्यापार और अर्थशास्त्र में रुचि रखने वाले दुनियाभर के विद्वतजन भारत की व्यापार नीति पर विमर्श के लिए शुक्रवार, 19 मार्च, 2021 को एक मंच पर आए। यह मंच था, इंडिया एक्ज़िम बैंक के 36वें स्थापना दिवस वार्षिक व्याख्यान का। यह व्याख्यान कोलंबिया यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र और इंडियन पॉलिटिकल इकनॉमी के जगदीश भगवती प्रोफेसर और नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष प्रोफेसर अरविंद पनगड़िया द्वारा दिया गया। व्याख्यान का विषय था- भारत की व्यापार नीतिः कल आज और कल।
प्रो. पनगड़िया ने भारत की व्यापार नीति के ऐतिहासिक पहलू प्रस्तुत करते हुए कहा कि आजादी के समय भारत ने आत्मनिर्भर होने की नीति को चुना। और इसी नीति के जरिए भारत ने यह तय किया कि हमें अपने उत्पादों को दुनिया के दूसरे बाजारों में बेचने और अपनी जरूरत का सामान दूसरे बाजारों से खरीदने की बाध्यता से आजाद होना है। यह लक्ष्य इस मकसद से रखा गया ताकि ऐसे समाजवादी समाज का निर्माण किया जा सके, जिसमें उत्पादन संबंधी गतिविधियों में राज्य की महती भूमिका हो और निजी निवेशों का आवंटन राष्ट्रीय सरकार द्वारा निर्धारित प्राथमिकताओं के आधार पर किया जाए, न कि लाभ के अवसरों को ध्यान में रखकर; और यही लक्ष्य इसे आर्थिक अक्षमता की ओर ले गया।
उन्होंने बताया कि 1950 से 1990 के दौरान भारत समृद्धि की दौड़ में दक्षिण कोरिया, ताइवान, सिंगापुर और चीन जैसे देशों तक से पिछड़ गया। आखिरकार, 1991 में भारत ने अपने बीते हुए कल से बाहर निकलते हुए व्यापार के उदारीकरण और बाजारवादी सुधारों का नया दौर अपनाया। इस परिवर्तन के अच्छे परिणाम मिले और देश की विकास दर पहली बार 6% तकजा पहुंची, जो 2003-04 की शुरुआत में बढ़कर 7.5% के स्तर पर भी रही।
भारत की वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीति पर प्रो. पनगड़िया ने कहा कि भारत ने दोहरे अंकों वाली विकास दर का सपना संजोया है और अपने इस सपने को साकार करने के लिए कुछ मुश्किल सुधार भी किए हैं। परन्तु, व्यापार नीति में भारत ने आयात प्रतिस्थापन पर जोर देते हुए एक बार फिर पीछे की ओर मुड़ने जैसा काम किया है। व्यापार नीति में इस परिवर्तन से उन परिणामों पर विपरीत असर पड़ सकता है, जिनके पूर्व में किए गए कुछ मुश्किल सुधारों से मिलने की संभावना थी। इस तरह, भारत के दोहरे अंकों की विकास दर को हासिल करने के सपने को झटका लग सकता है।
प्रो. पनगड़िया ने आने वाले कल बारे में कहा कि यदि भारत, आने वाले दो दशकों में जन-जन तक समृद्धि पहुंचाने के समृद्ध भारत के सपने को साकार करना चाहता है, तो उदार व्यापार नीति की ओर लौटना आवश्यक है। अन्यथा, यूके, जर्मनी, फ्रांस और यूएस जैसी प्रथम औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं की भांति भारतीयों को भी अपनी वर्तमान न्यून प्रति व्यक्ति आय को बढ़ाने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ेगा।
इस व्याख्यान के मॉडरेटर इंडिया एक्ज़िम बैंक के प्रबंध निदेशक श्री डेविड रस्कीना ने बताया, “अर्थशास्त्र या अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़े विषयों पर किसी ख्यातिलब्ध अर्थशास्त्री को आमंत्रित करते हुए 1986 में शुरू किए गए इस स्थापना दिवस वार्षिक व्याख्यान ने आज सार्वजनिक जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया है। इस वर्ष महामारी के चलते इसका वर्चुअल आयोजन किया गया और हम विभिन्न देशों के अधिक से अधिक श्रोताओं को इससे जोड़ पाने में सफल रहे। इससे पहले कई दिग्गज अर्थशास्त्रियों द्वारा यह व्याख्यान दिया जा चुका है। हमारे गत तीन वक्ता रहेः प्रो. गीता गोपीनाथ (हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर और वर्तमान में आईएमएफ की मुख्य अर्थशास्त्री, 2018), प्रो. अभिजीत बनर्जी (एमआईटी में प्रोफेसर, 2019), प्रो. हेलेन रे (लंदन बिजनेस स्कूल में प्रोफेसर, 2020)। यह हमारे लिए गौरव का विषय है कि 36वां स्थापना दिवस वार्षिक व्याख्यान प्रो. पनगड़िया द्वारा दिया गया और एक ऐसे विषय पर दिया गया, जिसकी प्रासंगिकता नीति निर्माताओं के लिए निरंतर बढ़ रही है।”
विस्तृत जानकारी के लिए कृपया संपर्क करें: श्री डेविड सिनाटे, मुख्य महाप्रबंधक, कॉर्पोरेट संचार समूह, dsinate@eximbankindia.in, +9122-22172829
